काठमांडू, नेपाल के संसदीय चुनाव में राजतंत्र की वापसी की मांग
करने वाली ताकतों को बड़ा झटका लगा है। चुनाव परिणामों में राजतंत्र समर्थक
दल राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी का लगभग पूरी तरह सफाया हो गया है और उनकी
पार्टी का सिर्फ एक उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर सका है। इस पार्टी के
राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र लिंगदेन सहित सभी बड़े नेता चुनाव में बुरी
तरह पराजित हो गए। इस नतीजे के बाद नेपाल की राजनीति में राजतंत्र समर्थकों
के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
नेपाल में राजतंत्र
समर्थक राजनीति का मुख्य चेहरा रही पार्टी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी
(आरपीपी) को इस चुनाव में अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका। चुनाव प्रचार के
दौरान पार्टी ने देश में राजतंत्र की बहाली को प्रमुख मुद्दा बनाया, लेकिन
मतदाताओं ने इस एजेंडे को पूरी तरह से नकार दिया।
आरपीपी के युवा
नेता ज्ञानेन्द्र शाही ने जुमला संसदीय क्षेत्र से अपनी सीट बचाने में
कामयाब रहे। बाकी इस पार्टी से जुड़े सभी नेता चुनाव हार गए हैं जिनमें
पूर्व अध्यक्ष तथा पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा, पूर्व पुलिस प्रमुख तथा
दो बार के सांसद एवं मंत्री ध्रुव बहादुर प्रधान, बीबीसी नेपाली सेवा के
वर्षों तक प्रमुख रहे चर्चित पत्रकार रवींद्र मिश्रा, इस पार्टी से
बार-बार मंत्री बने दीपक बहादुर सिंह, पार्टी के जो भी पदाधिकारी थे वो सब
के सब चुनाव हार गए हैं।
चुनाव परिणाम के तुरंत बाद पार्टी के
उपाध्यक्ष रविन्द्र मिश्रा ने न सिर्फ पार्टी परित्याग की घोषणा की बल्कि
उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास भी ले लिया। काठमांडू के १ नंबर संसदीय
क्षेत्र से चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की रंजू दर्शाना से बड़े
मतांतर से पराजित होने के बाद मिश्रा ने लिखा कि वो अब सक्रिय राजनीति को
अलविदा कह रहे हैं।
उन्होंने लिखा, "देशभर में आम जनता के मन में
राजशाही के प्रति अपार श्रद्धा और समर्थन होने के बावजूद राष्ट्रीय
प्रजातंत्र पार्टी के नेतृत्व की कमी कमजोरी, आपसी विवाद और निहित स्वार्थ
के कारण वह वोट में परिणत नहीं हो पाया। मैं अब दलीय राजनीति की अनुशासन से
बाहर होकर इस एजेंडे के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करता रहूंगा।"
राजनीतिक
विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का चुनाव परिणाम इस बात का संकेत है कि
नेपाल की बड़ी आबादी अब फिर से राजतंत्र की ओर लौटने के पक्ष में नहीं है।
इस नतीजे को नेपाल में 2008 के बाद स्थापित गणतांत्रिक व्यवस्था की
स्वीकार्यता के रूप में भी देखा जा रहा है। 2008 में नेपाल में राजतंत्र
का औपचारिक अंत हुआ था और देश को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया
था।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चुनाव परिणाम के बाद अब पूर्व
राजा ज्ञानेन्द्र शाह की सत्ता में वापसी की संभावना और कमजोर हो गई है।
हालांकि कुछ संगठनों और छोटे राजनीतिक समूहों द्वारा समय-समय पर राजतंत्र
की बहाली की मांग उठाई जाती रही है, लेकिन चुनावी राजनीति में इसका प्रभाव
लगातार सीमित होता दिख रहा है। आरपीपी के संस्थापक नेताओं में से एक रहे
पशुपति शमशेर राणा का कहना है कि जब तक राजतंत्र समर्थक दल चुनावी स्तर पर
व्यापक जनसमर्थन हासिल नहीं कर पाते, तब तक राजतंत्र की वापसी का सवाल
व्यावहारिक राजनीति में बहुत मजबूत नहीं बन पाएगा।
इस चुनाव में राजतंत्र समर्थक दलों के कमजोर प्रदर्शन के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं—
1.
गणतांत्रिक व्यवस्था की स्वीकार्यता: पिछले डेढ़ दशक में नेपाल की नई
राजनीतिक व्यवस्था धीरे-धीरे स्थापित हो चुकी है। युवा मतदाता खास तौर पर
गणतंत्र को ही भविष्य मानते हैं।
2. नए राजनीतिक चेहरों का उभार: इस
चुनाव में नए नेताओं और वैकल्पिक राजनीति के दावेदारों को ज्यादा समर्थन
मिला, जिससे पारंपरिक मुद्दों वाली पार्टियों को नुकसान हुआ। इसके अलावा इस
बार पूरा चुनाव बालेंद्र शाह पर केंद्रित रहा जिसकी लहर में अच्छे अच्छे
नेता, सभी पुराने दल सब पराजित हो गए।
3. राजतंत्र का पुराना
विवादित इतिहास: नेपाल में राजशाही के अंतिम वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता
और सत्ता संघर्ष की यादें अभी भी कई मतदाताओं के मन में मौजूद हैं।
4.
स्थानीय मुद्दों का प्रभाव: रोजगार, भ्रष्टाचार, विकास और शासन से जुड़े
मुद्दे इस चुनाव में ज्यादा प्रभावी रहे, जबकि राजतंत्र की बहाली का मुद्दा
मतदाताओं की प्राथमिकता नहीं बन पाया।
नेपाल के जाने-माने राजनीतिक
विश्लेषक सीके लाल का कहना है कि यह चुनाव परिणाम नेपाल की राजनीति में एक
स्पष्ट संदेश देता है कि जनता अब राजतंत्र की बहाली के मुद्दे को
प्राथमिकता नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि हमेशा के लिए राजशाही वापसी का
मुद्दा समाप्त हो गया यह कहना गलत है। कुछ इलाकों में और कुछ सीमित लोगों
के राजतंत्र समर्थक भावनाएं अभी भी मौजूद हैं और भविष्य में भी रहने वाली
हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में इसका प्रभाव लगातार सीमित होता जा रहा
है।
नेपाल में राजतंत्र समर्थकों को जनता ने नकारा, पूर्व राजा की सत्ता में वापसी का अध्याय खत्म
