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डॉ. बुधरी ताती को पद्मश्री सम्मान छत्तीसगढ़ के गौरव का एक अध्याय



रायपुर:  छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले की समाजसेविका डॉ. बुधरी ताती को पद्मश्री सम्मान छत्तीसगढ़ के गौरव का एक अध्याय है। स्थानीय लोगों की 'बड़ी दीदी' कहलाने वाली डॉ. बुधरी ताती को भारत सरकार ने वर्ष 2026 पद्मश्री सम्मान के लिए चुना है। अपना पूरा जीवन आदिवासी समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर देने वाली 'बड़ी दीदी' 1984 से दंतेवाड़ा के हीरानार गांव में रहकर आदिवासी समाज के उत्थान के लिए कार्य कर रही हैं।



बुधरी ताती दंतेवाड़ा जिले के गीदम ब्लॉक के हिरानार गांव की निवासी हैं। साल 1984-85 में उन्हें गुरमगुंडा आश्रम के लखमू बाबा से समाज सेवा की प्रेरणा मिली। उस समय उनकी उम्र लगभग 15 साल थी। परिवार को समझाने के बाद वे नागपुर स्थित अखिल भारतीय राष्ट्रीय सेवा समिति पहुंचीं। यहां उन्होंने 3-4 महीने का प्रशिक्षण लिया और अनुभव हासिल किया।


इसके बाद वे रायपुर होते हुए बस्तर पहुंचीं। उस दौर में आदिवासी इलाकों में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी आसान नहीं था। उन्होंने अपना पूरा जीवन महिला सशक्तीकरण, आदिवासी बच्चियों की शिक्षा और वृद्धों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। पद्मश्री उनके जीवन का 23वां सम्मान है। इससे पहले उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार और राष्ट्रीय स्तर पर भी कई बार सम्मानित किया जा चुका है।


डॉ. बुधरी ताती ने अपने जीवन के 40 साल बस्तर के अंदरूनी इलाकों में समाज सेवा करते बिताएं हैं। बारसूर में उन्होंने एक महिला प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया, जहाँ 15 से 35 वर्ष की महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई और अन्य हुनर सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाता है। उन्होंने अब तक 500 से अधिक महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई जैसे कार्यों में प्रशिक्षित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है। उनके सहयोग से कई महिलाएं आज नर्स के रूप में भी अपनी सेवाएं दे रही हैं। 


उन्होंने घोर नक्सल प्रभावित इलाकों और दुर्गम वनांचलों में उन्होंने साक्षरता अभियान और स्वास्थ्य जागरूकता के मशाल जलाई है। शिक्षा के अलावा, वे नशामुक्ति, स्वच्छता और पर्यावरण जागरूकता के लिए भी ग्रामीण इलाकों में निरंतर अभियान चलाती हैं।लोगों का भरोसा जीतने के लिए उन्होंने लगभग 545 गांवों की पैदल यात्रा की है। बुधरी ताती का कार्य केवल महिला सशक्तीकरण तक सीमित नहीं रहा। समाज सेवा के लिए अविवाहित रहकर उन्होंने उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर भी गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया। 


अंदरूनी इलाकों में स्वच्छता, पोषण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और बीमारियों से बचाव की जानकारी दी। कई गांवों में नशाखोरी के खिलाफ अभियान चलाया, जिसके चलते अनेक लोगों ने नशा छोड़कर नई जिंदगी शुरू की। हिरानार में उन्होंने वृद्धाश्रम की स्थापना की। इसके साथ ही वे अपनी भतीजी अन्ति वेक के साथ अनाथ और गरीब आदिवासी बच्चों की शिक्षा, रहन-सहन और भविष्य के लिए लगातार सक्रिय हैं।


बुधरी ताती ने बताया है कि अपने कार्य के दौरान उन्हें कई बार विरोध और हिंसा का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि एक समय ऐसा भी आया जब अबूझमाड़ के एक गांव में ग्रामीणों ने धारदार हथियारों के साथ उन्हें दौड़ा लिया।इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने का फैसला नहीं किया। वे कहती हैं, 'अगर डर जाती, तो आज भी महिलाएं अंधेरे में होतीं।' यही सोच उन्हें आगे बढ़ाती रही। 55 साल की उम्र में भी सक्रिय ताती का कहना है कि कि जब तक शरीर साथ देगा, वे समाज के लिए काम करती रहेंगी। डॉ. बुधरी ताती ने बताया कि अब तक उन्हें कुल 22 पुरस्कार मिल चुके हैं, जिनमें 3 राष्ट्रीय स्तर के सम्मान शामिल हैं। पद्मश्री सम्मान उनके लिए 23वां और सबसे प्रतिष्ठित सम्मान होगा।