जलपाईगुड़ी: कानून की नजर में सभी बराबर है, यह कथन व्यवहार में
कितना खोखला है, इसका जीवंत उदाहरण राजगंज के बीडीओ प्रशांत बर्मन का मामला
है। स्वर्णकार स्वपन कामिल्या हत्या कांड के आरोपित प्रशांत बर्मन की
गिरफ्तारी न होना अब सिर्फ एक कानूनी सवाल नहीं, बल्कि पूरे राज्य के
पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है।
कोलकाता
हाईकोर्ट ने 22 दिसंबर 2025 को प्रशांत बर्मन की अग्रिम जमानत खारिज करते
हुए 72 घंटे के भीतर आत्मसमर्पण का निर्देश दिया था। इसके बाद 26 दिसंबर को
उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी हुआ। इसके बावजूद 28 दिन बीतने के बाद
भी पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी है। पुलिस का यह दावा कि आरोपित
लापता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि प्रशांत बर्मन कोई साधारण
अपराधी नहीं, बल्कि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी है। आरोप है कि पुलिस और
प्रशासन के एक हिस्से ने जानबूझकर उन्हें समय दिया, ताकि वे सुप्रीम कोर्ट
से किसी तरह राहत हासिल कर सकें। यही कारण है कि गिरफ्तारी वारंट के बावजूद
वह खुलेआम कानून को चुनौती देते नजर आए।
इस बीच जलपाईगुड़ी में
हाईकोर्ट सर्किट बेंच के उद्घाटन समारोह में जब मुख्यमंत्री ने मंच से
लोकतंत्र और न्याय की बात की, उसी दौरान जिला प्रशासन यह तक नहीं बता सका
कि हत्या के आरोपित बीडीओ कहां हैं, वे कार्यालय क्यों नहीं आ रहे, या
उन्होंने अवकाश लिया है या नहीं। प्रशासन की यह चुप्पी कई सवालों को जन्म
देती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वपन कामिल्या की हत्या को
गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, क्योंकि वह एक साधारण स्वर्णकार थे। जबकि
अन्य मामलों में, भारी जनआंदोलन होने पर पुलिस तुरंत गिरफ्तारी करती है।
इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि कानून गरीब और कमजोर के लिए अलग, और
प्रभावशाली लोगों के लिए अलग है।
सूत्रों के अनुसार, फरार बीडीओ
दिल्ली में किसी प्रभावशाली व्यक्ति की शरण में है। पुलिस-प्रशासन की यह
निष्क्रियता न केवल पीड़ित परिवार के साथ अन्याय है, बल्कि न्याय व्यवस्था
में जनता के विश्वास को भी कमजोर कर रही है।
अब आम लोगों की मांग है
कि बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के प्रशांत बर्मन को तुरंत
गिरफ्तार कर कानून के हवाले किया जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह मामला राज्य
की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता के रूप में देखा
जाएगा।